Google, Facebook, Social Sites or History भरी पड़ी हैं “माँ” पर लिखी गई कविताओं , लेखों, कहानियों ओर विचारों से । हो भी क्यो नहीं , मां का दर्जा सबसे ऊंचा जो हैं । यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः अर्थात जहाँ नारियों की पूजा होती है वहा देवता निवास करते हैं । सही मायनों में माँ ही देवता है , मां की कुर्बानियां , वात्सल्य, मातृत्व, प्रेम , समर्पण और जाने कितने शब्द है जो लिखने लगे तो समय अस्त हो जाये पर मां को पूर्ण लिखना असंभव हैं ।

परंतु पिता पर बहोत कम लिखा गया हैं । कुछ समय पहले मैंने एक tv शो में एक व्यक्ति द्वारा पिता पर कही गयी कुछ मर्मस्पर्शी पंक्तिया सुनी , सुनकर बड़ा अच्छा लगा आंखों से न चाहते हुए भी अश्रुधारा बह निकली ।

मेरा अनुभव आप पाठकों के साथ साझा करना चाहता हूं ।मैंने 5 वर्ष पूर्व अपने पिता को खो दिया , 55 वर्ष की आयु में वे देवलोक हो गए । उनके न रहने के 2 वर्ष बाद मैं भी पिता बना । पहली बार जब मेरा बेटा बीमार हुआ और उसे अस्पताल ले जाना पड़ा उस समय उसके दर्द से मुझे तकलीफ हो रही थी , गुस्सा आ रहा था कि डॉक्टर इंजेक्शन लगाए तो वही ठोक देंगे और इसी प्रक्रिया में कंपाउंडर को मैंने उसकी कठोरता के लिए डांट दिया । कई बार जब मेरा बेटा गिर जाता या उसे हल्की सी भी चोट लग जाती तो अजीब सा दर्द होता जिसे मैं शब्दों में बयां नही कर सकता । अचानक उस दिन मैं रात को अकेला बैठा और पिताजी की याद सताने लगी , मैंने महसूस किया जिस तरह मैं अपने बेटे को प्यार करता हु की उसका दर्द मुझे महसूस होता है कई गुना ज्यादा , वही दर्द मेरे पिताश्री को भी महसूस हुआ होगा मेरे लिए जब मैं छोटा था । मुझे बहोत कुछ कहना था उनको , मैं उनके गले लगना चाहता था , हालांकि वो जब तक इस संसार मे रहे शान से जिये ओर मेरे साथ दोस्त की तरह बर्ताव करते थे फिर भी मैं कभी कभी पड़ने वाली डांट के पीछे छुपा प्यार समझ नहीं पाया , उस समय के भावनात्मक विचारों को मैं शब्दों में नही लिख सकता उस एहसास को सिर्फ महसूस किया जा सकता हैं । पिताश्री बहोत प्यार करते थे पर उन्होंने कभी जाहिर न किया ।

अंदर से मोम बाहर से पत्थर , यही हैं आदमी का मंजर ।

सभी पाठकों से अनुरोध है कि जीते जी अपने माता पिता को समय दे उन्हें सम्मान दे उनका ख्याल रखें , मां तो कह देगी आपको पर पिता कभी नही कहेगा कि वो क्या चाहता हैं । एक समय के बाद आपको एहसास हो जैसे मुझे हुआ तब तक बहोत देर हो चुकी होगी । एक कसक सी दिल में रह जाती हैं जो ताज़िन्दगी तीरों की भांति सीने में चुभती जाती हैं ।मातेश्वरी ऐसा कठिन समय किसी के जीवन मे न लाये परंतु ये कटु सत्य है कि “पिता” की परिभाषा ओर महत्व आपको उस दिन समझ आएगा जब आप उनकी कुर्सी खाली देखोगे ।

पुत्र का पहला हीरो पिता होता हैं वही घर की छत वही छांव होता हैं ! दो पल अपने पिताश्री को भी देना , उनके आशीर्वाद के बिना घर भी सिर्फ मकान होता हैं ! 

 आभार -  हरिओम सिंह राठौड़